महाभारतं

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संपूर्ण महाभारत

महाभारतम् संस्कृत-हिंदी गीताप्रेस गोरखपुर

 

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महाभारतम्(आङ्ग्लभाषा Mahabharata) महर्षिणा वेदव्यासेन विरचितः बहुप्रसिद्धः इतिहासः विद्यते। अस्मिन् ग्रन्थे कौरव-पाण्डवानां महायुद्धं मुख्य-विषयरूपेण वर्णितमस्ति। मानवजीवनस्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-रूपाः समस्तपुरुषार्थाः अत्र विशालग्रन्थे सन्निवेशिताः। अस्य महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्‌भगवद्‌गीता विद्यते। भगवता कृष्णेन मोहग्रस्तम् अर्जुनं प्रति ज्ञान-कर्म-भक्ति-विषयकः उपदेशः गीतायां प्रदत्तः। अस्यां गीतायामपि अष्टादश अध्यायाः सन्ति। मानव-जीवनस्य विविधविषयाः अत्र समीचीनतया प्रतिपादिताः सन्ति। इयं विश्वजनीन-कृतिः कालजयिनी चिरन्तनी एव।

महाभारतग्रन्थः त्रिभिः सवंत्सरैः विरचितं च -

त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थाय कृष्णद्वैपायनो मुनिः।

महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम्॥

इदं प्रायः सर्वे भारतीया विद्वांसो मन्यन्ते यत् महाभारतं प्राग् जयनाम्ना ततो भारतनाम्ना ततः परतश्च महाभारतनाम्ना प्रसिद्धम् । सूक्ष्मेक्षिकयाऽवलोकनेन ज्ञायते यत् - महाभारतस्य प्रगते चरणत्रयं विद्यते। -

प्रथमे चरणे - जयनामकं काव्यमेतत् ८८०० श्लोकपरिमितं व्यासकृतं धर्मचर्चाम् आश्रित्य महर्षि व्यासेन स्वशिष्याय वैशम्पायनाय श्रावितमभूत्।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।

प्रत्येकस्य अध्यायस्य आदौ विद्यमानः अयं प्रसिद्धः श्लोकः इदं निरूपयति ।

द्वितीये चरणे - भारतनामकं महाकाव्यमेतत् वैशम्पायनकृतं २४ सहस्रश्लोकपरिमितं (चतुर्विंशतिसाहस्री) वैशम्पायनेन अर्जुनस्य प्रपौत्राय जनमेजयाय नागयज्ञे श्रावितमभूत्।

तृतीये चरणे - महाभारतनामकं महाकव्यमेतत् लोमहर्षपुत्रेण सौतिकेन रचितं - एकलक्षश्लोकपरिमितं नैमिषारण्ये यज्ञकाले शौनकादिभ्यः ऋषिभ्यः श्रावितमभूत्। एवञ्च आख्यानमिदं त्रिभिर्वक्तृभिः महर्षिभिः विभिन्नश्रोतृभ्यः श्रावितम्।

महाभारतस्य अन्ते विद्यमानेन श्लोकेन इदं प्रमाणितं भवति -

उक्तं शतसहस्राणां श्लोकानामिदमुत्तमम्।

अस्य ग्रन्थस्य नूतनतमस्य रूपस्य नाम शतसाहस्री संहिता अपि अस्ति।

 

श्रीकृष्णदौत्यम्

 

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