अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ हि मध्यमा:।

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अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ हि मध्यमा:।

उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।

अधम मनुष्य धन की इच्छा करते हैं, मध्यम मनुष्य धन और मान की इच्छा करते हैं किन्तु उत्तम मनुष्य मान की ही इच्छा करते हैं। महान व्यक्तियों का धन तो मान ही है।

- गरुड.पुराण (1/115/12)

हिन्दू मन का उत्सव

सोचा जा सकता है कि सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपाल को साहित्य का नोबल सम्मान मिलने पर किसको खुशी हुई है और किसके मन में उदासी छाई हुई है? उन्होंने अब तक जो कुछ भी लिखा है वह एक हिन्दू मन की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है। अयोध्या आन्दोलन के समय एक साक्षात्कार में उन्होंने उसका समर्थन किया था और बाबरी ढांचे के ध्वंस को शताब्दियों से जमा हिन्दुओं के क्षोभ का प्रकटीकरण बताया था।

कुछ समय पहले उन्होंने न्यूयार्क टाइम्स के साहित्य परिशिष्ट में छह किस्तों में लम्बा लेख लिखा था। इसमें उन्होंने हिन्दुओं के सामूहिक स्मृतिलोप पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि हिन्दू अपने दमित इतिहास से स्वयं को काटकर जी रहे हैं।

उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार आर.के. नारायण के लेखन का उदाहरण देते हुए बताया कि उनकी कथाओं के काल्पनिक नगर मालगुड़ी से कुछ ही दूरी पर हम्पी के अवशेष हैं। यहां के विशाल और अद्वितीय हिन्दू साम्राज्य को मुस्लिम हमलावरों ने बर्बरता से ध्वस्त किया। परन्तु मालगुड़ी की अनंत कथाओं में कहीं भी, किसी भी मोड़ पर उस हिन्दू साहित्यकार को अपने पुरखों की वेदना और एक अद्वितीय साम्राज्य के टूटने की टीस दर्ज करने का मन नहीं हुआ। यह और कुछ नहीं अपने दमित इतिहास से खुद को दूर करने का प्रयास है।

विद्याधर सूरजप्रसाद नायपाल ने अपनी रचनाओं में सदियों से विदेशी हमलों और विदेशी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त भारतीय समाज को अपने मूल स्वरूप की पहचान करायी।

आश्चर्य की बात है कि नायपाल की रचनाओं के जिस सत्य का दर्शन नोबल पुरस्कार निर्णायक समिति ने किया उसे भारत की सेकुलर जमात न पढ़ पाई, न समझ पाई और न देख पाई। भारत के अंग्रेजी अखबारों को लीजिए। नायपाल के प्रति विषवमन से भरे रहते हैं। विशेषकर जबसे नायपाल ने "बियांड द बिलीफ' अर्थात् मतान्तरित मुस्लिमों की विडम्बनाओं एवं अपनी जमीन से कटकर अरब सांस्कृतिक वातावरण के कृत्रिम आवरण को ओढ़ने वाले जीवन पर लिखा, तबसे भारत के सेकुलरों ने नायपाल के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया।

पर इन तत्वों ने हमेशा से मुंह की खायी है। ये तत्व भारतीय मानस, भारतीय मन और अस्मिता से वैसे ही कटे हुए हैं, जैसे तालाब में पनपने वाली सत्यानाशी।

यह सत्य है कि हम इन नोबल पुरस्कारों पर दैवी श्रद्धा नहीं रखते, परन्तु नायपाल को मिला सम्मान दमित हिन्दू इतिहास की वेदना को मिली अन्तरराष्ट्रीय मान्यता है। इसलिए इस पुरस्कार का अवसर हिन्दू मन का उत्सव है।

विद्याधर सूरजप्रसाद नायपाल को और आप सबको भी बधाई!

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