टी.वी.आर. शेनाय चोट हो, पर

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-टी.वी.आर. शेनाय चोट हो, पर


हवाई अड्डों पर नहीं,

उग्रवादियों के कोषागारों पर

प्रत्येक युद्ध-संवाददाता को एक पुस्तक अनिवार्यत: पढ़नी चाहिए। वह पुस्तक है-"द स्ट्रैटेजिक बॉÏम्बग सर्वे' (सामरिक बमबारी सर्वेक्षण)। मैं इसे एक पुस्तक ही कहता हूं, पर वास्तव में यह दूसरे वि·श्व युद्ध के बाद किए गए अध्ययन की रपट है।

माना जा रहा है कि उस युद्ध में वायु-शक्ति ने निर्णायक भूमिका निभायी थी। युद्ध में वायु सेना वास्तव में कितनी महत्वपूर्ण रही थी, इसे तोलने के लिए अमरीकियों ने एक दल का गठन किया था। उस दल में हार्वर्ड के अर्थशास्त्री जान कैनेथ गालब्रोथ और जार्ज बाल थे जो बाद में अमरीका के उपमंत्री बन गए थे।

उस दल ने निष्कर्ष निकाला था कि वस्तुत: बमबारी ने कोई बड़ा कमाल नहीं कर दिखाया था, जब तक संयुक्त सेनाएं जर्मन भूमि पर नहीं पहुंची थीं, तब तक जर्मन युद्ध-उत्पादन स्थिर रहा था यानी उसने कुछ विशेष गतिविधि नहीं दर्शायी थी।

"सामरिक बमबारी सर्वेक्षण' प्रचार की शक्ति का तीखा अभियोगपत्र ही है। सैन्य मशीनों का खुद को बहकाना और वह सब कि मीडिया कितनी तत्परता से "सूक्ष्मता' सम्बंधी दावों को मान लेता है, अभियोगपत्र सबका खुलासा करता है।

यह कोई एकमात्र उदाहरण नहीं है। 1967 में विश्लेषकों को बुलाकर उस समय चल रहे वियतनाम युद्ध पर अध्ययन करने को कहा गया था। उनकी रपट ने एक टीस पैदा कर दी थी। उसमें निष्कर्ष था कि उस युद्ध में उत्तरी वियतनाम के प्रत्येक अमरीकी डालर नुकसान के बदले अमरीका को 1.60 डालर चुकाने पड़ रहे थे।

उसके बाद खाड़ी युद्ध हुआ। अनेक लोगों को सूक्ष्म लक्ष्य को भेदते "निर्देशित' प्रक्षेपास्त्रों की वे सुंदर तस्वीरें याद होंगी। करीब आधे दशक बाद उसके विश्लेषण ने सिद्ध किया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। अगर हम उस तरह की बारीकी देखना चाहते हैं तो हमें "स्टार ट्रैक' देखना चाहिए न कि खबरों को।

इसलिए काबुल और कंधार में बरस रहे प्रक्षेपास्त्रों को देखते हुए उन पर कुछ तीखी टिप्पणी करने के लिए मुझे क्षमा कीजिएगा। लेकिन इस सबसे अमरीका को आखिर उपलब्धि क्या हुई?

"क्रूज' प्रक्षेपास्त्र महंगे हैं, करीब 750,000 अमरीकी डालर से लेकर दस लाख डालर तक अकेले एक प्रक्षेपास्त्र की कीमत बताई जाती है। हमले के पहले दिन ही ऐसे 50 प्रक्षेपास्त्र उपयोग किए गए। उसका परिणाम क्या था? कई अफगान हवाई अड्डे निष्क्रिय हो गए हैं। लेकिन क्या कोई अफगान वायु सेना है भी, जिसका जिक्र किया जा सके? साढ़े तीन करोड़ से 5करोड़ मिलियन डालर के बीच राशि उन हवाई अड्डों को ध्वस्त करने में लगा दी गई जो ज्यादा काम में ही नहीं आ रहे थे!

मैं उन पाठकों से माफी मांगता हूं जो एक युद्ध को डालर और सेंट के तराजू में तोलने के विरुद्ध हैं, पर जरा उस व्यक्ति पर भी एक नजर डालें जो युद्ध की कला और कौशल से कुछ परिचित था। नेपोलियन ने कहा था कि धन "युद्ध का सम्बल' है। (यह जानते हुए कि सोने को खाया नहीं जा सकता, उसने यह भी कहा,"एक सेना अपने पेट के बल आगे बढ़ती है।')

सेना के सम्बंध में अपने मत को कहने का जोखिम उठाते हुए, एक अनुमान है: दीर्घकालिक संदर्भ में, अमरीकी वित्तमंत्री को युद्ध जीतने के लिए पेंटागन में बैठे रक्षामंत्री से कहीं अधिक माथापच्ची करनी होगी। उग्रवादियों के कोष खोजकर उन्हें रोक देने की कोशिश अरब सागर में विमानवाहकों के किसी जमावड़े से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

विडम्बना है कि इस बात की नब्ज जानने वालों में खुद बिन लादेन भी है। मुझे याद है कहीं मैंने पढ़ा था कि उस व्यक्ति ने एम.बी.ए. की उपाधि प्राप्त की हुई है। यह सही हो या गलत, पर उसने एक नहीं अनेक बार दिखा दिया है कि व्यावहारिक अर्थशास्त्र पर उसकी गजब की पकड़ है। जब वह सूडान में निर्वासित जीवन जी रहा था, उसने उस समय ब्रोड, मक्खन बेचने की दुकान से लेकर बैंक चलाने तक के हर काम किए-और उन सबमें उसने खूब पैसा भी बनाया।

बहरहाल, बिन लादेन की ब्रोड, मक्खन की दुकान की डबलरोटी ने अमरीका व यूरोप के बाजारों के मुंह का स्वाद नहीं बिगाड़ा। जी नहीं, वे लोग तो यह सोच रहे हैं कि कहीं ओसामा बिन लादेन 11 सितम्बर को एक-आध दाव आजमाने तो नहीं आया था-एक हाथ से हमला और दूसरे से लूट का माल संभालकर कहीं वह रफूचक्कर तो नहीं हुआ।

कैसे? निश्चित ही तेजड़िए के रूप में। आमतौर पर, हर व्यक्ति अपने ऐसे शेयर बेचता है जो वास्तव में उसके पास तो नहीं होते पर वह आगे किसी तय तारीख को वे शेयर सौंप देने का वायदा कर लेता है। माना जाता है कि उसी दौरान किसी समय, यह संभव हो सकता है कि उन शेयरों को उस कीमत पर ले लिया जाए जो उस कीमत से कम हो जिस पर उन्हें किसी ने बेचा था।

यह एक प्रकार से जुआ ही है। लेकिन अमरीका पर हमलों की पूर्व जानकारी ने मंदड़ियों को भारी लाभ पहुंचाया। दो उद्योगों पर चोट पड़ना निश्चित था-उड्डयन और बीमा। अंतत: जब बाजार खुले, तो खूनखराबा हो गया, शेयर औंधे मुंह गिर गए। (जैसा आभास था, रक्षा उद्योग के शेयर एकमात्र अपवाद रहे।)

खोज-खबर रखने वाली संस्थाओं ने गौर किया कि हमलों से पहले असामान्य गतिविधियां दिखी थीं जब उड्डयन और बीमा क्षेत्रों में मंदी की आशंका जतायी जा रही थी। पता नहीं कि शस्त्र उद्योग के शेयरों की खरीद में कोई बढ़ोत्तरी हुई या नहीं? कुछ लोग कहते हैं कि इसके पीछे बिन लादेन था जो बाजार से जुड़े अपने कौशल का प्रयोग करके लाखों डालर अपनी झोली में भर रहा था।

हर समझदार व्यक्ति आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का समर्थन करता है। पर चल रहे सैन्य हमलों से मुझे थोड़ी निराशा हुई है। (थोड़ी अधिक सूचनाओं का इंतजार करना शायद बेहतर होता, लेकिन मुझे लगता है कि 11 सितम्बर के हमलों के बाद एक माह के भीतर ही राष्ट्रपति बुश को कुछ कर दिखाना था।) पर धन की आवक पर नजरें गढ़ानी चाहिए-उग्रवादियों तक पहुंचने के लिए यह किसी "निर्देशित' प्रक्षेपास्त्र से बेहतर ही होगा।

प्रवेश पटलं

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